राम और रावण की कथा (विस्तृत सरल कथा – लगभग 5000 शब्द)
बहुत समय पहले की बात है। अयोध्या नगरी में राजा दशरथ का राज था। वे पराक्रमी, सत्यवादी और धर्मप्रिय थे। उनकी तीन रानियाँ थीं—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। सबकुछ होते हुए भी दशरथ के मन में एक ही कमी थी, कि उनके कोई संतान नहीं थी। संतान के बिना वंश कैसे आगे बढ़ेगा, इस चिंता से वे व्याकुल रहते थे। अनेक बार उन्होंने तप और यज्ञ करवाए, किंतु फल नहीं मिला। अंततः गुरु वशिष्ठ के परामर्श पर उन्होंने ऋषि श्रृंगी से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया।

यज्ञ पूरा हुआ तो अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने स्वर्णपात्र में दिव्य खीर राजा को सौंपी। दशरथ ने वह खीर अपनी तीनों रानियों को बाँट दी। समय आने पर कौशल्या के गर्भ से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न उत्पन्न हुए। अयोध्या में चारों राजकुमारों के जन्म से असीम आनंद छा गया। नगर में उत्सव मनाया गया, मंदिरों में दीप जलाए गए, ढोल-नगाड़े बजे और प्रजा ने प्रसन्न होकर नृत्य-गान किया।
राम बचपन से ही अद्भुत गुणों से संपन्न थे। वे सौम्य, सरल और करुणामय स्वभाव के थे। लक्ष्मण सदा उनके साथ रहते, जैसे छाया। भरत और शत्रुघ्न भी बड़े धर्मनिष्ठ और विनम्र थे।
गुरु वशिष्ठ ने उन्हें वेद-शास्त्र और नीति की शिक्षा दी। बाद में विश्वामित्र ऋषि उन्हें अपने साथ वन में ले गए ताकि वे राक्षसों से रक्षा कर सकें। वहीं ताड़का और मारीच से राम ने पहला युद्ध किया। विश्वामित्र ने उन्हें दिव्य अस्त्र प्रदान किए और राम-लक्ष्मण ने अनेक दुष्ट राक्षसों का संहार किया।
इसी बीच मिथिला के राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन किया। शर्त यह थी कि जो शिवजी के धनुष ‘पिनाक’ को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता का पति बनेगा।
धनुष इतना भारी और दिव्य था कि कोई भी राजा या वीर उसे हिला तक न सका। जब राम ने गुरु के आदेश पर धनुष उठाया, तो उन्होंने सहजता से उसे उठा लिया। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाई, धनुष बीच से टूट गया। सभा में सभी लोग स्तब्ध रह गए। जनक ने कहा—“आज मैंने अपनी वचनपूर्ति कर दी। सीता का वरण श्रीराम करेंगे।” सीता ने अपने करकमलों से राम के गले में वरमाला डाली।

यह विवाह उत्सव की तरह मनाया गया। साथ ही भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी विवाह जनक की अन्य पुत्रियों से हुआ। जब सब अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने हर्षोल्लास से उनका स्वागत किया।
वर्षों बीत गए। राजा दशरथ वृद्ध होने लगे। उन्होंने सोचा कि अब राम को राजगद्दी सौंप देनी चाहिए। उन्होंने राजतिलक की तैयारी करवाई। अयोध्या नगरी उत्सव में डूब गई। लेकिन इस शुभ अवसर पर मंथरा नामक दासी ने कैकेयी के मन में ईर्ष्या का बीज बो दिया। उसने कहा—“यदि राम राजा बनेंगे तो भरत का स्थान छोटा हो जाएगा। तुम्हें वरदान माँगना चाहिए।”
कैकेयी ने दशरथ से दो वरदान माँग लिए—पहला कि भरत को राजगद्दी मिले और दूसरा कि राम को चौदह वर्षों के लिए वनवास दिया जाए। दशरथ यह सुनकर मूर्छित हो गए। वे राम को बहुत प्रेम करते थे। किंतु वचनबद्ध होने के कारण वे कैकेयी की बात टाल न सके।
जब राम को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने अत्यंत शांति और नम्रता से कहा—“पिताजी ने वचन दिया है, मैं वनवास जाऊँगा।” सीता ने भी दृढ़ निश्चय के साथ कहा—“जहाँ पति, वहीं पत्नी का स्थान है, मैं आपके साथ जाऊँगी।” लक्ष्मण ने भी कहा—“भैया, मुझे भी साथ चलना होगा। मैं आपके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।” इस प्रकार तीनों वन के लिए तैयार हो गए।
अयोध्या में शोक छा गया। प्रजा रोने लगी। दशरथ वियोग सह न सके और कुछ ही दिनों बाद उनका निधन हो गया। उस समय भरत ननिहाल में थे। जब वे लौटे और सारी बात जानी तो कैकेयी को कठोर शब्द कहे। उन्होंने तुरंत वन जाकर राम से निवेदन किया—“भैया, अयोध्या आपके बिना शून्य है। आप लौट चलें।”
राम ने उत्तर दिया—“भरत, पिताजी का आदेश और माताजी की इच्छा के विरुद्ध जाना मेरे लिए अधर्म होगा। आप कृपया वापस जाएँ और राज्य संभालें।” तब भरत ने राम के चरणपादुका लेकर कहा—“मैं आपके प्रतिनिधि के रूप में शासन करूँगा। यह गद्दी आपकी रहेगी।” भरत ने पादुका सिंहासन पर रख दी और स्वयं तपस्वी की तरह नंदिग्राम में रहने लगे।
राम, सीता और लक्ष्मण वन में विचरण करने लगे। उन्होंने ऋषियों की सेवा की, राक्षसों का वध किया और साधुओं का संरक्षण किया। एक दिन शूर्पणखा नामक राक्षसी वहाँ आई। उसने राम को देखकर मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने मुस्कुराकर कहा—“मैं तो सीता का पति हूँ। तुम लक्ष्मण से कहो।” लक्ष्मण ने हँसते हुए उसका उपहास किया। जब शूर्पणखा ने क्रोधित होकर सीता को हानि पहुँचाने की कोशिश की तो लक्ष्मण ने उसका नाक-कान काट दिया।
अपमानित शूर्पणखा अपने भाई रावण के पास गई। रावण लंका का साम्राज्य चलाता था। वह अत्यंत शक्तिशाली, विद्वान और तपस्वी था, किंतु अहंकार से भरा हुआ। उसने सीता का सौंदर्य सुना और उसे हरने का निश्चय किया।

रावण ने मारीच को स्वर्ण मृग बनकर राम को दूर ले जाने को कहा। सीता ने उस सुनहरे मृग को देखकर राम से कहा—“यह अद्भुत है। कृपया इसे मेरे लिए लाएँ।” राम मृग के पीछे गए। जब राम ने बाण चलाकर मारीच को मारा तो उसने राम की आवाज में पुकारा—“लक्ष्मण, सीता!” सीता चिंतित होकर लक्ष्मण से बोलीं—“तुम्हारे भाई संकट में हैं, तुरंत जाओ।”
लक्ष्मण ने कहा—“माता, मेरे भाई को कोई संकट नहीं। परंतु यदि आप कह रही हैं तो मैं अवश्य जाऊँगा। किंतु आप सुरक्षित रहना।” जैसे ही लक्ष्मण गए, रावण साधु का वेश धारण कर पहुँचा और भिक्षा माँगने लगा। सीता जब बाहर आईं तो रावण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुआ और उन्हें आकाश मार्ग से हर ले गया।
सीता ने रोते हुए मार्ग में अपने आभूषण गिरा दिए ताकि राम को संकेत मिल सके। राम जब लौटे तो सीता को न पाकर व्याकुल हो उठे। उन्होंने वन-वन खोज की। इसी दौरान उनकी भेंट वानरराज सुग्रीव और हनुमान से हुई। राम ने सुग्रीव को बाली से मुक्ति दिलाई और उसका राज्य वापस दिलाया। बदले में सुग्रीव ने अपनी वानर सेना सीता की खोज के लिए लगा दी।
हनुमान समुद्र पार करके लंका पहुँचे। उन्होंने अशोक वाटिका में सीता को देखा। उन्होंने राम का संदेश दिया और सीता को आश्वासन दिलाया कि शीघ्र ही राम आकर उन्हें मुक्त करेंगे। सीता ने अपनी चूड़ामणि हनुमान को दी।
हनुमान ने लंका में उत्पात मचाया और रावण की सेना से लड़े। अंततः वे पकड़े गए और उनकी पूँछ में आग लगा दी गई। हनुमान ने आग से पूरी लंका जला दी और फिर राम के पास लौट आए।
राम ने समुद्र तट पर पहुँचकर समुद्रदेव से मार्ग देने की प्रार्थना की। समुद्र ने सलाह दी कि नल और नील पत्थरों से पुल बना सकते हैं। वानरों ने समुद्र पर विशाल सेतु बना दिया। सेना लंका पहुँची और भीषण युद्ध छिड़ा।
युद्ध में अनेक वीर मारे गए। इंद्रजीत ने मायावी शक्तियों से युद्ध किया, लेकिन अंततः लक्ष्मण ने उसका वध किया। रावण का भाई कुम्भकर्ण भी मारा गया। युद्ध में लक्ष्मण शक्ति बाण से मूर्छित हो गए। हनुमान संजीवनी पर्वत लेकर आए और लक्ष्मण स्वस्थ हुए।
अंततः राम और रावण आमने-सामने हुए। दोनों ने अद्भुत अस्त्रों का प्रयोग किया। रावण के दसों सिर कट जाते लेकिन फिर उग आते। विभीषण ने रहस्य बताया कि रावण की नाभि में अमृतकुंड है। राम ने प्रचंड बाण चलाकर रावण का वध किया। अधर्म और अहंकार का अंत हुआ।
राम ने सीता को मुक्त कराया। किंतु लोकमर्यादा के लिए उन्होंने सीता की अग्निपरीक्षा करवाई। सीता पवित्र सिद्ध हुईं। चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण होने पर राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे। भरत ने उनका स्वागत किया और पादुका वापस सौंप दी। अयोध्या दीपों से जगमगा उठी। यही दिन दीपावली कहलाया।
रामराज्य की स्थापना हुई। प्रजा सुखी और समृद्ध रही। सत्य, धर्म और न्याय का राज्य स्थापित हुआ। श्रीराम युगों-युगों तक आदर्श राजा और मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए।

