बसपा -इनेलो दोनों के धड़े में बबली के पुराने समर्थक हैं
इनेलो बसपा गठबंधन प्रत्याशी जितनी ज्यादा बढ़त लेगा सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी को जाएगा।
टोहाना ,/विजय रंगा, टोहाना हल्के में मुख्य रूप से मुकाबला दो राष्ट्रीय पार्टियों के बीच हो रहा है तथा क्षेत्रीय दलों में तो देखें तो इंडियन नेशनल लोकदल के प्रत्याशी कुनाल कर्ण सिंह को हालांकि एक राष्ट्रीय पार्टी बसपा का साथ है
परन्तु इस राष्ट्रीय पार्टी का उत्तर प्रदेश में क्या हश्र हुआ है उस बात से सभी राजनैतिक दल भली भांति परिचित हो चुके हैं ऐसे में बसपा से गठबंधन से इनेलो को कितना फायदा या नुकसान होगा इस बात का भी इनेलो को जल्द ही अहसास हो भी गया होगा।
इनेलो अगर अकेले चुनाव लड़ती तो उसे ज्यादा राजनैतिक फायदा होता, ऐसा राजनैतिक पंडितों का सोचना है, दलितों का बसपा पर पहले वाला विश्वास में अगर कहीं कमी आई है तो उसकी जिम्मेवारी बसपा सुप्रीमो मायावती की रणनीति में कहीं न कहीं फेलियर रहा है।
दलितों का यूपी चुनावों में अगर रूझान बसपा से हट कर समाज वादी पार्टी -कांग्रेस गठबंधन की ओर हुआ है तो हरियाणा का पढ़ा-लिखा दलित वर्ग तो पहले से बसपा से किनारा कर चुका है और बात रही हरियाणा में बसपा के जनाधार की तो वह इतना प्रभावी नहीं है कि उससे गठबंधन कर जीता जा सके।
वो दिन बीते दिनों की बात बनकर रह गई जब बसपा का जबरदस्त बोलबाला था और नब्बे प्रतिशत दलित वर्ग बसपा के साथ था परंतु बसपा सुप्रीमो मायावती ने उल्टे सीधे राजनैतिक फैसले लेकर बसपा का बेड़ा ग़र्क करने में कोई कौर कसर नहीं छोड़ी है।
अब टोहाना हल्के के बसपा के दलित वोटों के बल पर इनेलो अच्छी बढ़त हासिल करना चाहती है तो कहीं न कहीं उनकी यह भूल ही साबित हो रही है।
बसपा के कुछ अटपटे फैसलों के कारण ही पढ़ें लिखे दलित वर्ग का रूझान बसपा से हटकर अन्य ऐसे राजनैतिक दल की तरफ बढ़ गया जो धर्म व जाति की राजनीति से हट कर सांप्रदायिक सौहार्द बना रखने वाला राजनैतिक दल साबित हो रहा हो।
और ऐसी छवि दलितों को कांग्रेस पार्टी में देखने को मिली तो अब लोकसभा चुनावों के बाद हरियाणा प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी इसी परिपाटी को दोहराया जा सकता है।
हरियाणा में पढ़ा लिखा तबका अब बसपा से दूरी बना ऐसी पार्टी को जिताने जा रहा है जो गैर साम्प्रदायिक हो या दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसी पार्टी को समर्थन देंगे जो सांप्रदायिकता फैला कर धर्म के नाम वोट लेने की विचारधारा रखती हो।
इसलिए हरियाणा प्रदेश के चुनाव में लगभग सभी दलों की तस्वीर साफ हो चुकी है कि किसे कितने वोट मिलेंगे और किसे किस जाति वर्ग का समर्थन मिलने जा रहा है।
ऐसी स्थिति में टोहाना हल्के में इनेलो का जनाधार जाट बिरादरी में ज्यादा है इनेलो को दलितों के सहारे कोई विशेष लाभ होता नहीं दिख रहा है।साफ है कि टोहाना इनेलो नेता टोहाना से जितने ज्यादा वोट लेगा उसका सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी को होगा यह निश्चित है।
