सिरसा, 5 जून। हरियाणा व पंजाब के किसानों के आंदोलन को बीजेपी ने हलके में लिया तो परिणाम प्रभावित हुए नजर आए है।
खासकर किसान आंदोलन-2 के दौरान सडक़ों पर लगाए गए अवरोधक व किसानों पर किए गए लाठीचार्ज के बाद किसान
वर्ग में बीजेपी के प्रति रोष बढ़ गया। इस रोष को बीजेपी ने शायद हलके में लिया। अगर बीजेपी किसानों की भावनाओं को
समझती तो शायद मार्ग बंद करने की बजाय उनको दिल्ली जाने का रास्ता देती और उनकी जहां तक संभव होती मांग पर गौर फरमाती।
दरअसल दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान से ही किसान वर्ग बीजेपी से खफा था। पर मांगों को मानने की आश्वासन
देकर पीएम ने आंदोलन पर तो विराम लगा दिया पर बाद में मांगों पर कार्रवाई न करने से किसान फिर से बिफर गए। और
फिर से आंदोलन की तैयारी करने लगे। जब किसान दोबारा दिल्ली जाने लगे तो हरियाणा के सभी मार्ग बंद कर दिए गए। यहां
तक कि किसानों पर लाठियां बरसाई गई। उसके बाद तो किसानों ने ठान ली कि लोकसभा चुनावों में बीजेपी के प्रत्याशियों को विरोध जता कर अपना बदला लेंगे।
ऐसे ही हुआ। जब बीजेपी के प्रत्याशी गांवों में वोट मांगने जाते थे तो किसानों के विरोध का सामना करना पड़ता रहा। यही
कारण रहा कि कांग्रेस को हरियाणा में पांच सीटों पर बढ़त मिली और जो सीटें बीजेपी जीती उन सीटों पर 2019 के मुकाबले
काफी कम वोट बीजेपी को मिले। यही स्थिति पंजाब में रही। इस बार तो पंजाब में बीजेपी का खाता तक नहीं खुल पाया।
अब अगर कांग्रेस यह समझ कर ओवर कॉन्फिडेंस में रहेगी कि हमारी पार्टी ताकतवर हो गई है तो आगामी विधानसभा चुनावों
में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ सकती है। क्योंकि लोकसभा में कांग्रेस को वोट ज्यादा आने के कारणों में सबसे अहम कारण
यह भी था कि किसान वर्ग बीजेपी के प्रत्याशियों को हराने की मंशा से कांग्रेस को वोट दे गया। अब अगर कांग्रेस ने किसानों की नहीं सुनी तो कांग्रेस को भी हाशिए पर आने में देर नहीं लगेगी।
आंदोलन के बाद ताकतवर हुए किसान संगठन
किसान आंदोलन-1 व उसके बाद आंदोलन-2 से किसानों की ताकत बढ़ी है। शायद अब किसान संगठनों की बात को सरकार
गौर से सुनेगी। क्योंकि किसानों की एकजुटता ने दिखा दिया कि उनकी अनदेखी का नतीजा तख्तापलट के रूप में भुगतना
पड़ सकता है। किसान आंदोलन के कारण किसान की आवाज न केवल देश में बल्कि इंटरनेशनल स्तर तक बुलंद हुई।
